छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार उन्मूलन में लोक आयोग के कार्य एंव भूमिका की दशा एवं दिशा

 

डाॅ. श्रीमती वेदवती मण्डावी1, संदीप कुमार चैहान2

1शोध निर्देशक विभागाध्यक्ष (राजनीति विज्ञान) शासकीय विश्वनाथ यादव तामस्कर स्वशासी महा. दुर्ग

2शोधार्थी शोधकेन्द्र-षासकीय विश्वनाथ यादव तामस्कर स्वशासी महा. दुर्ग

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प्रस्तुत शोधपत्र में छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार उन्मूलन में लोक आयोग के कार्य एंव भूमिका की दशा एवं दिशा का उल्लेख किया गया है। 1 नवम्बर 2001 को छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद सन् 2002 में राज्य शासन ने अपने शक्तियों का प्रयोग करते हुए एक अधिनियम 30 बनाया जो अधिनियम छत्तीसगढ़ लोक आयोग अधिनियम कहलाया, यह अधिनियम राज्य की जनता की भलाई के लिए एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच आयोग के रुप में कार्य कर रहा है। जिससे नागरिकों को बिना किसी भय एवं भेदभाव के प्रकरण का निपटारा किया जा रहा है। लोक आयोग राज्य के नागरिकों हितों एवं कानूनी अधिकारो का संरक्षण कर राज्य के नागरिकों के मन मे निष्पक्ष एवं विश्वसनिय संस्था बन चुकी है।

 

ज्ञम्ल्ॅव्त्क्ैरू भ्रष्टाचार, लोक आयोग, भूमिका

 

 

 

भूमिकाः

सन् 1947 में स्वतंत्रता के बाद से ही लोकपाल जैसी संस्था स्थापित किये जाने की आवश्यकता बार-बार महसूस की जा रही थी। प्रशासनिक सुधार आयोग ने अक्टूबर 1966 में प्रस्तुत किये गयेअपने प्रतिवेदन में ‘‘भारतीय नागरिकों की होने वाली समस्याओं का समाधान करने की कठिनाई के अन्तर्गत प्रशासनिक भ्रष्टाचार, कुप्रशासन, अवचार के संबंध में कमी, असफलतायें तथा प्रशासन के अपेक्षित मापदण्डों में ईमानदारी और क्षमता की कमी के संबंध में उपचार के बारे में प्रस्तुत की गई।

 

तथ्यों के विश्लेषण के उपरांत भारतीय नागरिकों को उपरोक्त समस्याओं के निदान के लिए उपलब्ध व्यवस्था और उसके स्थान पर नई व्यवस्था प्रस्तुत करने पर भी विचार किया गया। तात्कालिक समय में उपलब्ध संस्थायें जैसे-संसद, प्रशासन (कार्यपालिका) तथा न्यायपालिका (न्यायालय/ट्रिब्युनल) हमेशा आम नागरिकों की पहुंच के बाहर थीं, जिसके अनेक कारण थे जैसे अत्यधिक विलंब, मुकदमों की अधिक फीस और बोझिलता आदि। इसके अतिरिक्त आयोग ने यह भी पाया कि कार्यपालिक आवश्यकताओं के कारण बहुत से मामले उत्पन्न होते हैं, जो व्यक्ति विशेष के साथ अन्याय करते हैं, जिसके विरूद्ध कोई सहायता उपलब्ध नहीं है। उपरोक्त कारणों को देखते हुए स्क्ेन्डेनियन देशों और कामनवेल्थ देशों में संसदीय आयुक्तों के जैसी लोकायुक्त और लोकपाल जैसी संस्था स्वर्गीय श्री मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में गठित प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा जब छत्तीसगढ़ राज्य 0प्र0 राज्य के अन्तर्गत था, उस समय 0प्र0 लोकायुक्त और उपलोकायुक्त अधिनियम 1981 प्रभावशील थे। .. राज्य के गठन के उपरान्त भी उसी अधिनियम को .. राज्य के लिए अनुकूलित किया गया था, लेकिन बाद में ..शासन ने अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए पृथक लोकायुक्त अधिनियम बनाया, जो कि वर्ष 2002 में अधिनियम क्रमांक 30 के रूप में लागू हुआ और जिसके द्वारा पूर्व में लागू अधिनियम क्रमांक 37/31 को निरसित किया गया। .. राज्य में इस नये अधिनियम में विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम 1947 के प्रावधान अनुकूलित नहीं किये गये। साथ ही पूर्व अधिनियम में जो संभागीय समिति नियम 1995 था, उसे भी लागू नहीं किया गया। सन्दर्भ ग्रंथ क्र.1 से

 

अध्ययन विषय का राजनीतिक महत्व:

भारतीय संविधान में भ्रष्टाचार के उन्मूलन में विभिन्न प्रावधान दिए गए है केन्द्र और के द्वारा विभिन्न प्रकार की स्वतंत्र और संवैधानिक संस्थाएँ बनाई गई है। जिनके द्वारा भ्रष्टाचार पर नियत्रंण किया जा सकता है। लेकिन इतनी संस्थाएँ होने के बाद भी भारत में भ्रष्टाचार दिनों दिन बढ़ता जा रहा हैं। आज यह स्थिति हैं कि विष्व में यह नौंवे स्थान पर हैं। इसलिए संसद भवन में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्री राजीव गांधी ने स्वीकार किया था कि अगर सरकार 100 रू. एक व्यक्ति के विकास के लिए भेजती हैं तो वह उनके पास पहुंचते-पहुंचते 15 रू. हो जाता हैं। जो कि उनके कथन को भ्रष्टाचार सिद्ध करता हैं भारत में भ्रष्टाचार की बहुत सारी घटनायें हो रही हैं जिस पर नजर रखने के लिए एक मजबूत राजनैतिक इच्छा शक्ति की आवष्यकता हैं क्यांेकि अगर सरकार या अधिकारी इसमें शामिल है जैसे कि हमारे देष का कोलगेट घोटाला, इस्पेक्ट्रम घोटाला मध्यप्रदेष का व्यांपम घोटाला जिसमें सरकार के मंत्री के अलावा अधिकारी भी अभियुक्त हैं जिनकी जाँच माननीय उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय के निगरानी में सी.बी.सी. सी.बी.आई. कर रही हैं। क्योंकि अधिकारी किसी भी देष प्रषासनिक व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी होते हैं क्यांेकि सरकारें तो बदलती रहती हैं लेकिन अधिकारी नहीं छत्तीसगढ़ में नाॅन घोटाला एक अच्छे राजनैतिक कत्र्तव्य का उदाहरण हैं जिसमें जांच चल रही हंै। बिना राजनैतिक इच्छा शक्ति के यह घोटाला उजागर नहीं होता। जब राजनैतिक इच्छा शक्ति मजबूत होगी तो ऐसे घोटालें और भ्रष्टाचार में कमी आयेगी और देष-प्रदेष का अच्छे से विकास होगा इन्ही राजनैतिक इच्छा षक्ति के कारण अन्ना हजारे जैसे गंाधीवादी ने अपने सामाजिक एंव राजनैतिक इच्छा शक्ति से लोगों को लोकपाल जैसी सवैंधानिक संस्थाओं को स्थापित करने के लिए सड़क से संसद तक आंदोलन करने के लिए प्रोत्तसाहित किया। जिसके फलस्वरुप संसद ने कानून बनाकर केन्द्र और राज्यों में लागू किया जा सका

 

शोध का उद्देष्य:

शोध पत्र का प्रमुख उद्देष्य छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार उन्मूलन में लोक आयोग के कार्य एंव भूमिका की दशा एवं दिशामें है जिसमें छत्तीसगढ़ में लोक आयोग के स्थापित होने के बाद लोगों को कितना लाभ हुआ। जिसमें निम्नलिखित उद्देष्य निर्धारित किये गये है।

1.     लोकायुक्त के कार्य एंव अधिकारों का अध्ययन करना।

2.     भ्रष्टाचार के उन्मूलन में लोकआयोग की भूमिका का अध्ययन करना।

3.     पारदर्षिता एंव जवाबदेही के प्रति लोकायुक्त की कार्यप्रणाली का अध्ययन करना।

4.     जनता को अपने कार्य संपादित कराने में लोकआयोग की सार्थकता कितनी सिद्ध हुई है यह ज्ञात करना।

5.     भ्रष्टाचार के उन्मूलन में संवैधानिक संस्थाओं को और मजबूत करने के लिए समयानुकूल आवष्यक संषोधनों हेतु सुझाव देना।

6.     भ्रष्टाचार के उन्मूलन हेतु संवैधानिक संस्थाओं को और अधिक स्वायत्ता के संबंध में अध्ययन करना।

 

अध्ययन पद्धतियाँ:

शोध हेतु सामग्री एवं सूचनाओं का संग्रहण प्रमुख दो पद्धतियों को प्रयुक्त किया जायेगा।

1.     प्राथमिक स्त्रोत           

2.     द्वितीयक स्त्रोत

 

     प्राथमिक स्त्रोतः-प्रथम पद्धति में शोधकर्ता द्वारा अध्ययन क्षेत्र की

मौलिक जानकारी स्वयं के माध्यम से संकलित की जाती हैं जिसमें प्रमुख चार चरण हैं।

.    साक्षातकार/प्रष्नावली

.    अवलोकन

. रेण्डम सैम्पलिंग या दैव निदर्षन

. सर्वेक्षण

 

(साक्षातकार/प्रष्नावली:-

उत्तरदाताओं से साक्षातकार सैम्पलिंग, प्रष्नावली के आधार चयनित 300 उत्तरदाता।

 

()   अवलोकन:-

लोक आयोग के रायपुर स्थित कार्यालय में जाकर वहाँ पर चल रहे मामलांे का उत्तरदाताओं से प्रष्नावली के माध्यम से प्रष्न पूछकर और साक्षातकार के माध्यम से प्राप्त अभिमत के आधार पर विष्लेषण किया जायेगा।

 

()   दैवनिदर्षन:-

सैम्पलिंग सामाजिक शोध एंव सर्वेक्षण की आधारषिला है। किसी भी प्रकार का अध्ययन करने से पूर्व शोधकर्ता को यह तय करना होता है कि वह समूह के सभी सदस्यों से सम्पर्क स्थापित करके तथ्यों का संकलन करेगा। जिसको दैव निदर्षन के अंतर्गत वृहत इकाई के लघु स्वरुप को आधार मानकार प्राप्त अभिमत के द्वारा संकलित सामग्री का विष्लेषण तालिका के माध्यम से करके निष्कर्ष निकाला जायेगा। इसके लिए निम्नानुसार विधि प्रयुक्त की जा सकती है।

 

1.     निदर्षन विधि द्वाराः-

1.     निदर्षनः-

चंूकि शोध क्षेत्र संपूर्ण छत्तीसगढ़ राज्य को सम्मलित करता है। जिससे शोधार्थी द्वारा समस्त 27 जिलों में भ्रमण करके प्रत्येक उत्तरदाताओं से संपर्क करना, प्रष्न पूछना संभव नहीं है। इसीलिए इस प्रस्तावित शोध को पूरा करने में चयनित 300 उत्तरदाताओं का अभिमत संकलन प्रस्तावित है।

 

जैसे छत्तीसगढ़ में वर्तमान 27 जिलों से जितने प्रकरण लोक आयोग के पास पंजीकृत होते हैं। उनमें से चयनित 300 उत्तरदाताओं का चयन किया जायेगा, जो सभी क्षेत्र, वर्ग, श्रेणी पदों के शासकीय अषासकीय इकाई से संबंध रखते हैं। उनसे प्राप्त अभिमत का संकलन विष्लेषण किया जाना प्रस्तावित है।

 

()   सर्वेक्षण:-

सामाजिक विज्ञान में प्राथमिक स्त्रोत के अंतर्गत प्रयुक्त विधि का चैथा चरण सर्वेक्षण भी महत्वपूर्ण है। जिसके अंतर्गत शोधार्थी द्वारा शोध क्षेत्र से प्राप्त आकड़ो का जायजा लेने के लिये प्रत्यक्ष रुप से सर्वेक्षण करके भौतिक सत्यापन करके शोध के निष्कर्ष को और अधिक प्रामाणिक, सटीक मौलिक रुप दे सकता हैं।

 

     द्वितीयक स्त्रोतः-

इसके अंतर्गत प्रकाषित पत्र पत्रिकाओं,पुस्तकें, लेखषोधप्रबंध सामाचार पत्र, पाठ्य पुस्तकें की रिपोर्ट तथा इंटरनेट के माध्यम से जानकारी प्राप्त कर षोध का अध्ययन गहन तरीके से करके उचित परिणाम निकालना हैं। इसके अंतर्गत रायपुर स्थित लोक आयोग के ग्रंथालय से वार्षिक रिर्पोट एवं अन्य मामलों का अध्ययन भी शामिल है।

 

परिकल्पना:

किसी भी शोध या शोधकार्य प्रारंभ करने के पूर्व शोधकर्ता को समस्या के संबंध में कार्य-कारण संबंध प्रतिमान के आधार पर पूर्व चिंतन कर लेना चाहिए। इस प्रकार उपकल्पना एक तीक्ष्ण अनुमान है जिसका प्रतिपादन अस्थाई स्वीकरण, अवलोकित तथ्यों अथवा दषाओं की व्याख्या करने तथा षोधकार्य को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता हैं। किसी भी शोध में हम उपकल्पना के बिना एक कदम भी आगे नही बढ़ सकते हैं।

 

शोध परिकल्पना शोधकार्य का महत्वपूर्ण चरण होता हैं। शोध परिकल्पना एक कार्यकारी आधार होता है जो कि शोधार्थी को एक दिषा प्रदान करता हैं शोध उपकल्पना को एक ऐसी कल्पना कहा जाता है। जिसका परीक्षण शोध कार्य के दरम्यान किया जाता हैं। मेरे द्वारा चयनित इस शोध प्रंबंध में मेरी पूर्व कल्पना है कि जवाबदेही और पारदर्षिता किसी भी सवैंधानिक संस्था के जांच करने के तथ्यों में से हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक है क्यों कि जब तक जवाबदेही और पारदर्षिता नहीं होगी तब तक सवैंधानिक संस्थाओं पर लोगों का विष्वास कायम नहीं होगा। अतः मेरी उपकल्पना के आधार पर जवाबदेही और पारदर्षिता में बाधक तत्वों पर प्रकाष डालना है तथा इसको व्यवहार में लाने के उपाय को ढूढ़ना है।

 

1.     लोकायुक्त के कार्य एंव अधिकार भ्रष्टाचार के उन्मूलन में आषिंक रुप से सफल हुए है।

2.     लोकायुक्त, भ्रष्टाचार के उन्मूलन में सहायक सिद्ध हुआ है।

3.     पारदर्षिता एंव जवाबदेही के प्रति लोकायुक्त की कार्यप्रणाली में और सुधार किये जाने की आवष्यकता है।

4      जनता को अपने कार्य संपादित कराने में लोकआयोग से विभिन्न तकनीकी परेषानियों का सामना करना पड़ता है।

5.     भ्रष्टाचार के उन्मूलन में संवैधानिक संस्थाओं को और मजबूत करने की आवष्यकता है।

6      भ्रष्टाचार के उन्मूलन में संवैधानिक संस्थाओं को और स्वायतता देने की आवष्यकता है।

 

निष्कर्ष:

आजादी के बाद से ही भ्रष्टाचार के निवारण हेतु एक ऐसी संस्था की आवष्यकता महसूस की जा रही थी कि जो आम जनता के मुद्दे को बिना किसी तकलीफ एवं डर के निवारण करने में सहायता प्रदान कर सके जिससे कि जनता में एक ऐसा संदेष जाये कि अब कोई भी व्यक्ति जो कि गैर कानुनी एवं भ्रष्टाचार में लिप्त होगा वह अब बच नहीं सकेगा। उस पर अब कानूनी कार्यवाही निष्चित रुप से होगी चाहें वह व्यक्ति कैसा भी हो चाहे वह रसूख वाला हो, या राजनेता हो, या नौकरसाह हो, या किसी भी ऐसे संवैधानिक पद पर नियुक्त हो जहां पर भ्रष्टाचार की गुजंाइस हो ऐसा व्यक्ति अब कानूनी कार्यवाही से नहीं बच सकता है क्यों कि राज्य में अब लोक आयोग एक संवैधानिक संस्था के रुप में कार्य कर सहा है।

 

1 नवम्बर छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद सन् 2002 से राज्य में लोक आयोग कार्य कर रहा है। जहां पर प्रतिदिन प्रकरण पर सुनवाई होती है और जो भी प्रकरण दर्ज होते है उनका निपटारा किया जा रहा है लोक आयोग को ऐसा नहीं होना चाहिए कि वह जांच तो कर सकता है लेकिन कार्यवाही नहीं ऐसा होने से जनता के मन में नाकारात्मक विचार उत्तपन्न होने की संभावना है। जिसके आयोग पर से विष्वास कम होगा।

 

लोक आयोग को अधिकार नहीं है कि वह किसी भी व्यक्ति पर कोई कार्यवाही सीधे रुप से कर सकता है। वह सिर्फ अपने प्रतिवेदन से संबधित विभाग को कार्यवाही करने की अनुषंसा करने कर सकता है। वह कोई भी दण्ड सीधे नहीं दे सकता है। सिर्फ अपना अभिमत को दे सकता है।

 

सुझाव:

(1)    लोक आयोग को और अधिकार एवं षक्तियां प्रदान करने की आवष्यकता है। जिससे कि प्रकरण का अंतिम निपटारा लोक आयोग में ही हो तथा दोषी व्यक्ति को आयोेग स्वयं दण्ड दे सकें।

(2)    लोक आयोग के द्वारा प्रकरण की सुनवाई में ज्यादा समय नहीं लेना चाहिए क्यों कि समय ज्यादा लगने से आयोग में विष्वास कम हो सकता है।

(3)    लोक आयोग को इतनी शक्ति प्रदान होनी चाहिए की वह प्रकरण की अंतिम सुनवाई के साथ-साथ न्यायालय की तरह दण्ड भी दे सकें।

(4)    लोक आयोग को ऐसा होना चाहिए कि वह आम नागरिकों का हितों का ख्याल रखकर निर्णय एवं अंतिम कार्यवाही को करें।

(5)    लोक आयोग को अपने प्रति सकारात्मकताएंव विष्वास का भाव आम नागरिकों में जगाने के लिए सख्त और मजबूत होनेे की आवष्यकता है।

 

संदर्भ:

1ण्    छत्तीसगढ़ लोक आयोग वार्षिक प्रतिवेदन विवरणिका (2002 .2003)

2ण्    आषिफ मोहम्मद (2013) प्दजमतकपेबपचसपदंतल श्रवनतदंस िब्वदजमउचवतंतल त्मेमंतबी पद ठनेपदमेे  709 श्रनदम 2013 टव्स् 5 छव् 2

3ण्    भानू विनोद (2011) ब्स्त्। त्मेमंतबी च्ंचमत ैमतपमेरू छवण्1 ।चतपस 2011

4ण्    डाॅ.कुण्डू आर.के. (2012) प्व्ैत्श्रवनतदंस िभ्नउंदपजपमे ंदक ैवबपंस ैबपमदबम ;श्रभ्ैैद्धप्ैैछरू 2279.0837 प्ैठछरू 2279.0845ण् टवसनउम 2 प्ेेनम 4 ;ैमच.व्बजण् 2012द्धए च्च् 04.09ूूूण्पवेतरवनतदंसेण्वतह

5ण्    डाॅ.बी.एल.फाड़िया (2005) भारतीय लोक प्रषासन में नौकरषाही व्यवस्था.

6ण्    डाॅ.एम.पी.षर्मा (1970) भारत में लोकप्रषासन की अवधारणा.

 

 

 

 

 

Received on 03.06.2019            Modified on 14.06.2019

Accepted on 23.06.2019            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(2): 571-574.